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वाराणसी में माँ कालरात्रि के दर्शन को उमड़ी आस्था, नवरात्र के सातवें दिन भक्तों की भारी भीड़

  • bharatvarshsamaach
  • Mar 25
  • 2 min read
बाइट: मंदिर महंत शिवम दीक्षित

रिपोर्टर: नौमेश कुलदीप श्रीवास्तव

लोकेशन: वाराणसी

दिनांक : 25.03.2026


नवरात्र के सातवें दिन विशेष पूजन

चैत्र नवरात्र के सातवें दिन माँ कालरात्रि के स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व होता है। इसी क्रम में वाराणसी की कलिका गली स्थित प्राचीन मंदिर में माँ कालरात्रि के दर्शन के लिए सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।


भव्य स्वरूप के दर्शन को उमड़े श्रद्धालु

मंदिर में विराजमान माँ कालरात्रि का भव्य और दिव्य स्वरूप भक्तों को आकर्षित करता है। देर रात से ही श्रद्धालु कतारों में खड़े होकर माँ के दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।


शत्रु नाश और रक्षा की देवी

धार्मिक मान्यता के अनुसार, माँ कालरात्रि को शत्रु नाश और रक्षा की देवी माना जाता है। भक्त अपनी सुरक्षा, समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए माँ के चरणों में शीश नवाते हैं।


विशेष पूजन और भोग का महत्व

माँ कालरात्रि को नारियल अर्पित करने की विशेष परंपरा है। इसके साथ ही लाल चुनरी, अड़हुल (गुड़हल) के फूलों की माला और मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे माँ प्रसन्न होकर अपने भक्तों को सद्बुद्धि और सुरक्षा प्रदान करती हैं।


सैकड़ों वर्षों से आस्था का केंद्र

कलिका गली स्थित यह प्राचीन मंदिर सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। विशेष रूप से नवरात्र के दौरान यहाँ दर्शन का महत्व और भी बढ़ जाता है।


भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता

भक्तजन माँ से अपने जीवन की समस्याओं के समाधान, सुरक्षा और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मान्यता है कि माँ कालरात्रि अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं और जीवन की बाधाओं को दूर करती हैं।


क्या बोले महंत

बाइट: मंदिर महंत शिवम दीक्षित ने बताया कि नवरात्र के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है और दूर-दूर से भक्त यहाँ दर्शन के लिए आते हैं।


निष्कर्ष

नवरात्र के पावन अवसर पर वाराणसी में आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है, जहाँ हजारों श्रद्धालु माँ कालरात्रि के चरणों में नतमस्तक होकर आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।



भारतवर्ष समाचार

संपर्क: 9410001283

वेबसाइट: www.bharatvarshsamachar.org



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