पहले निर्माण, फिर बुलडोज़र: आखिर LDA की लापरवाही का बोझ जनता कब तक उठाएगी?
- bharatvarshsamaach
- 13 hours ago
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लेखक: शिखर, अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ
लखनऊ तेजी से बढ़ता हुआ महानगर है। नई कॉलोनियां, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स और बहुमंजिला इमारतें शहर के विस्तार की तस्वीर पेश करती हैं। लेकिन इस विकास के बीच एक बड़ा सवाल लगातार खड़ा हो रहा है — आखिर अवैध निर्माणों को बनने तक रोका क्यों नहीं जाता?
लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) का मुख्य उद्देश्य शहर में सुनियोजित विकास सुनिश्चित करना और अवैध निर्माणों पर समय रहते कार्रवाई करना है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई अवैध निर्माण महीनों नहीं, बल्कि वर्षों तक बनते रहते हैं। इमारतें पूरी हो जाती हैं, फ्लैट बिक जाते हैं, व्यवसाय शुरू हो जाते हैं और तब जाकर प्रशासन को उनकी “अवैधता” दिखाई देती है। इसके बाद अचानक बुलडोज़र कार्रवाई शुरू होती है।
सबसे अहम सवाल यही है कि जब निर्माण हो रहा था, तब LDA कहाँ था?
क्या प्रशासन को जानकारी नहीं होती?
अवैध निर्माण कोई छोटी या छिपी हुई गतिविधि नहीं होती। बड़ी इमारतों के निर्माण में लगातार मजदूर, मशीनें, ट्रक, निर्माण सामग्री और व्यावसायिक गतिविधियां शामिल रहती हैं। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं होती।
यदि जानकारी नहीं थी, तो यह गंभीर प्रशासनिक विफलता है।और यदि जानकारी होने के बावजूद निर्माण चलता रहा, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि संभावित मिलीभगत की ओर भी इशारा करता है।
समय पर कार्रवाई क्यों नहीं?
यदि प्रशासन शुरुआत में ही नोटिस जारी कर प्रभावी कार्रवाई करे, तो अवैध निर्माणों को रोका जा सकता है। लेकिन अक्सर ऐसा तब होता है जब निर्माण पूरी तरह खड़ा हो चुका होता है। इसके बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई होती है, जिसमें सरकारी मशीनरी, पुलिस बल, बुलडोज़र, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक संसाधनों पर भारी खर्च किया जाता है।
यह पूरा खर्च आखिरकार जनता के टैक्स से ही उठाया जाता है।
दोहरी मार झेलती है जनता
इस तरह की लापरवाही का नुकसान दो स्तर पर होता है—
शहर के नियोजित विकास को नुकसान पहुंचता है
करदाताओं के धन की बर्बादी होती है
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ध्वस्तीकरण के बाद शायद ही कभी यह सार्वजनिक होता है कि निर्माण के दौरान जिम्मेदार अधिकारी कौन थे और उनकी जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई।
केवल भवन मालिक ही दोषी नहीं
निश्चित रूप से अवैध निर्माण करने वाला व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है, लेकिन सवाल यह भी है कि जिस विभाग का काम ही ऐसे निर्माण रोकना था, उसकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
यदि किसी क्षेत्र में वर्षों तक अवैध निर्माण होते रहें, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की विफलता मानी जानी चाहिए।
जरूरत “बुलडोज़र मॉडल” नहीं, “प्रिवेंटिव गवर्नेंस” की
शहरों का विकास केवल ध्वस्तीकरण से नहीं होता। असली जरूरत ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की है, जहां अवैध निर्माण की पहली ईंट रखते ही कार्रवाई हो जाए।
साथ ही ऐसी नीति भी होनी चाहिए, जिसमें प्रशासनिक लापरवाही सिद्ध होने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और ध्वस्तीकरण में हुए सरकारी खर्च की समीक्षा अनिवार्य हो।
जवाबदेही तय होना जरूरी
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में केवल कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समय पर कार्रवाई न करना भी उतना ही बड़ा प्रश्न है।
जब तक अवैध निर्माणों पर शुरुआती स्तर पर रोक नहीं लगेगी और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हर बुलडोज़र कार्रवाई के बाद जनता यही सवाल पूछती रहेगी—
“अवैध निर्माण बनने तक LDA आखिर कर क्या रहा था?”
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भारतवर्ष समाचार ब्यूरो
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