झांसी: जैन परंपरा का अद्भुत उदाहरण: मुनिश्री विष्णुसागर जी महाराज की अंतिम यात्रा बनी श्रद्धा का महोत्सव
- bharatvarshsamaach
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रिपोर्टर: मोहम्मद कलाम कुरैशी, झांसी
लोकेशन : झांसी,उत्तर प्रदेश
दिनांक : 16 फरवरी 2026
जैन धर्म में साधु-संतों की मृत्यु को शोक नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति की दिशा में एक पवित्र यात्रा माना जाता है। इसी आध्यात्मिक परंपरा का अनुपम उदाहरण उस समय देखने को मिला जब मुनिश्री विष्णुसागर जी महाराज ने समता और साधना के साथ समाधिमरण (सल्लेखना) धारण कर इस संसार से विदा ली। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने शोक नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्सव के रूप में उनकी अंतिम यात्रा को मनाया।
आध्यात्मिक जीवन का अद्भुत उदाहरण
झाँसी महानगर स्थित श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र सांवलिया पार्श्वनाथ करगुंवाजी में मुनिश्री विष्णुसागर जी महाराज ने समतापूर्वक समाधिमरण किया। उनका जीवन अत्यंत सरल, सात्विक और आध्यात्मिक मूल्यों से परिपूर्ण रहा। वे गृहस्थ जीवन में अजित कुमार जैन, पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य, अनिल जैन तथा प्रसिद्ध कवयित्री सुधा जैन के पूज्यनीय पिता थे।
रेलवे में लोको पायलट के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उनका जीवन पूरी तरह आध्यात्मिक साधना में समर्पित हो गया। वर्षों से उनके मन में वैराग्य और आत्मकल्याण की भावना प्रबल थी, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने जीवन के अंतिम चरण में सल्लेखना जैसे कठिन और महान व्रत को धारण किया।
सल्लेखना व्रत: आत्मा की शुद्धि का मार्ग
10 फरवरी को उन्होंने अन्न, जल और गृह का त्याग कर यम सल्लेखना व्रत धारण किया। यह व्रत जैन धर्म में आत्मा की शुद्धि और मोह-माया से पूर्ण विरक्ति का प्रतीक माना जाता है। परिवार और समाज के लोगों ने उनकी भावना का सम्मान करते हुए जैन आचार्यों से आशीर्वाद प्राप्त किया।
इसी दौरान पदविहार करते हुए मुनिश्री विश्वमित्रसागर जी महाराज का पावन सान्निध्य उन्हें प्राप्त हुआ। उनके करकमलों से मुनिश्री विष्णुसागर जी महाराज ने जैनेश्वरी मुनि दीक्षा धारण की और उसी रात्रि पूर्ण समता और शांति के साथ समाधिमरण प्राप्त किया।
अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
जैसे ही उनके समाधिमरण की सूचना श्रद्धालुओं को मिली, अतिशय क्षेत्र करगुंवाजी में दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। श्रद्धालुओं ने नम आंखों और श्रद्धा से भरे हृदय के साथ अपने पूज्य संत को अंतिम विदाई दी।
उनकी अंतिम डोला यात्रा में समाज के गणमान्य नागरिक, जैन समाज के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। सभी ने उनके महान तप, त्याग और साधना को नमन करते हुए अर्घ्य समर्पित किया।
जैन दर्शन में मृत्यु नहीं
जैन धर्म में समाधिमरण को आत्मा की सर्वोच्च अवस्था की ओर बढ़ने का मार्ग माना जाता है। यह मृत्यु नहीं, बल्कि जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की दिशा में एक आध्यात्मिक कदम है।
मुनिश्री विष्णुसागर जी महाराज का समाधिमरण न केवल उनके परिवार और समाज के लिए, बल्कि समस्त जैन समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका जीवन और त्याग आने वाली पीढ़ियों को वैराग्य, संयम और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाता रहेगा।
समाज के लिए प्रेरणा बने मुनिश्री
मुनिश्री विष्णुसागर जी महाराज का संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण रहा कि आत्मशुद्धि, त्याग और साधना से जीवन को महान बनाया जा सकता है। उनका समाधिमरण जैन परंपरा की महानता और आध्यात्मिक ऊंचाइयों का जीवंत उदाहरण है।
उनकी स्मृति सदैव श्रद्धालुओं के हृदय में जीवित रहेगी और उनका जीवन समाज को धर्म, संयम और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता रहेगा।
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